

Tashkent Uttargatha ताशकंद उत्तरगाथा Book In Hindi-Neerja Madhav
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विदेश की धरती पर लाल बहादुर शास्त्री रहस्यमय मृत्यु आज तक रहस्य ही बनी हुई है। यह स्वतंत्र भारत के राजनीतिक माथे पर लगा हुआ एक अफसोसनाक दाग है, जिसे शायद ही कभी पूरी तरह से मिटाया जा सके। लेकिन उस दाग के मूल कारणों को जान लेना भी इसलिए जरूरी है, ताकि भविष्य में इतिहास दोहराया न जा सके। नई पीढ़ियाँ उसे समझेंगी तभी सतर्क होंगी और तभी इस प्रकार के संजालों के प्रति सावधान रहते हुए उसके समाधान की दिशा में प्रयासरत होंगी। शास्त्रीजी का प्रधानमंत्री होना भारतीय राजनीति का एक 'टर्निंग पॉइंट' था, जो मात्र अठारह महीनों का था, लेकिन एक मील का पत्थर तो गाड़ ही गया कि राष्ट्र को आत्म गौरव और शक्तिसंपन्न बनाने के लिए वही एक रास्ता है, जो इस 'टर्निंग पॉइंट' का संकेतक कहता है। तो स्वाधीनता के कुछ वर्षों पहले से ही कांग्रेस की नीतियों का यह मूर्खतापूर्ण लचीलापन सभी को समझ में आने लगा था, जो स्वाधीन होने के बाद बिल्कुल मुखर हो उठा था । विदेशी ताकतें भी नहीं चाहती थीं कि भारत स्वतंत्र होकर भी भारत के हाथों में रहे। राजनीतिक दृष्टि से भारत भले ही सत्ता सँभाले, पर उसकी निर्भरता विदेशों पर बनी रहे। इसलिए कांग्रेस की ही एक लॉबी यह नहीं चाहती थी कि लाल बहादुर शास्त्री जैसा देसी नेता प्रधानमंत्री बने । - इसी उपन्यास से ताशकंद में शास्त्रीजी की असामयिक रहस्यमय मृत्यु के तार अभी तक उलझे हुए हैं। इस औपन्यासिक कृति में उन घटनाओं, प्रकरणों और कुचक्रों पर प्रकाश डाला गया है, जिन्होंने शास्त्रीजी की 'हत्या' का षड्यंत्र रचा। भारतीय राजनीतिक इतिहास के एक काले अध्याय पर अंतर्दृष्टि डालती पठनीय कृति ।
Language: Hindi
Page No: 192
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