

Swatantrata Sangram Mein Rashtriya Swayamsevak Sangh Ki Bhoomika-Vijay Nahar
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यह पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका तथा भारत के स्वाधीनता आंदोलन के उस अनदेखे और कम चर्चित आयाम को सामने लाती है, जिसे इतिहास की मुख्यधारा में प्रायः उपेक्षित किया गया। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के क्रांतिकारी जीवन, उनके वैचारिक चिंतन और 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मूक किंतु सुदृढ़ राष्ट्र-निर्माण यात्रा को यह कृति तथ्यात्मक प्रमाणों और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ प्रस्तुत करती है। विजय नाहर ने स्पष्ट किया है कि संघ की भूमिका केवल प्रत्यक्ष आंदोलनों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह समाज को भीतर से संगठित, अनुशासित और स्वाभिमानी बनाने का एक दीर्घकालिक प्रयास था। डॉ. हेडगेवार की क्रांतिकारी पृष्ठभूमि, हिंदुत्व और राष्ट्रीयता का वैचारिक अधिष्ठान, विभाजनकाल की चुनौतियाँ तथा स्वयंसेवकों के योगदान-इन सभी पक्षों को पुस्तक संतुलित और शोधपरक दृष्टि से उद्घाटित करती है। यह ग्रंथ उन मूक तपस्वियों की गाथा है, जिन्होंने मंच से नहीं, बल्कि परदे के पीछे रहकर राष्ट्र की आधारशिला रखी। यह पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को स्वतंत्रता संग्राम की उस अंतःसलिला धारा के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसने समाज को भीतर से सशक्त बनाया। इतिहास, राष्ट्रवाद और भारत की सांस्कृतिक चेतना में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक विचारोत्तेजक, तथ्यपरक और प्रेरणादायी है।
Language: Hindi
Page No: 224
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