

Radhakrishna Ki Kahaniyan-Radhakrishna
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आठ दहाई से भी अधिक कहानियाँ लिखने वाले राधाकृष्ण कथित हिंदी की मुख्यधारा से अनजान ही हैं। अपने पत्रों का और राँची से आदिवासी पत्रिका का लंबे समय तक संपादन करने के बावजूद हिंदी ने वह मान व सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। 45 साल पहले राँची के अपने खपरैल के मकान में अंतिम साँस लेने वाले इस कथाकार की 2011 में जन्मशताब्दी स्थनीय स्तर पर मनाई गई। हंस, कथादेश व एकाध लघुतर पत्रिकाओं ने इस मौके पर प्रयास भर याद करने की रस्म अदायगी जरूर की। राँची दूरदर्शन ने जरूर काफी पैसा खर्च कर उन्हें याद किया। जिन वक्ताओं ने इस मौके पर बोलने की जहमत उठाई, जिसके लिए दूरदर्शन ने उनके कठिन परिश्रम का काफी मोटा पारिश्रमिक चुकाया, फिर कभी उन्होंने याद किया हो, ऐसा दिखा नहीं। दरअसल, इन वक्ताओं में बहुतेरे ऐसे थे, जिन्होंने इस अवसर पर बोलने के लिए ही कुछ उनका यहाँ-वहाँ से पढ़ा था। हमारे शहर के महान् व बड़े आलोचकों की नजर में राधाकृष्ण उनकी आलोचकीय परिधि में समाने योग्य कभी रहे ही नहीं।
Language: Hindi
Page No: 192
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