

Manas Ki Prasangikta-Ram Janma Singh
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आज के युग में जहाँ थोड़ी-थोड़ी संपत्ति के लिए भाई भाई को मार डालता है; हिस्से में थोड़ी सी न्यूनता हो जाने पर पुत्र अपने माता-पिता की निर्मम हत्या तक कर देता है, वहीं पिता द्वारा दिए गए चक्रवर्ती राज्य को छोटा भाई (श्री भरत) बड़े भाई की संपत्ति समझता है और चौदह वर्ष तक पर्णकुटी में रहकर उसकी रक्षा करता है। आज जबकि टूटते परिवारों से दुःखी समाज के हितैषी संत-महात्मा तथा सरकारें चिंतित हैं और संयुक्त परिवारों की पुनर्स्थापना हेतु अनेक प्रयास कर रही हैं, ऐसे समय में ‘रामचरितमानस’ बहुत ही प्रासंगिक है। हमारे सामाजिक जीवन की आधारशिला परिवार है। यहीं हम संस्कारित होते हैं। ‘रामचरितमानस’ हमको यह सिखाता है कि पारिवारिक सदस्यों के त्याग, सहयोग, एक-दूसरे को सम्मान देने, प्रेम और पारस्परिक संतुष्टि से ही कोई कुटुंब समृद्धशाली बनता है। अपने लिए वनवास दिए जाने की घटना को श्रीराम कितनी सहजता और प्रसन्नता से लेते हैं, तभी तो असमंजस में पड़े पिता से कहते हैं, ‘‘पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै॥’’ यह पुस्तक आज के टूटते-बिखरते समाज और परिवारों को प्रेम, सद्भाव, साहचर्य, सह-अस्तित्व, सहिष्णुता एवं अन्य मानवीय गुणों से समाहित कर आदर्श समाज की स्थापना का शाश्वत संदेश देनेवाली ‘रामचरितमानस’ की प्रासंगिकता और महत्त्व को रेखांकित करती है।
Language: Hindi
Page No: 164
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