

Gaumukh se Gangasagar - Krishna Gopal Chaudhary
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एक सन्यासी की आत्मकथा गोमुख से गंगासागरगहरी जीवन रेखा यह किताब उन लोगों को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो अपने जीवन में कभी-न-कभी घर बार छोड़ सन्यासी बनने की बात सोची तो हो लेकिन ऐसा वे कभी कर नहीं पायें। ऐसा इसलिए नहीं होता कि वे सन्यासी जीवन के प्रति आकर्षण महसूस करने लग गए है। बल्कि वे अपने वर्तमान के सामने छाए अंधकार में घुटन महसूस करने लगते है। सन्यासी के बारे में सोचते ही हमारे मन कई प्रकार की कल्पनाएं उभरने लगती है। एक तो उन महान विभूतियों की होती है जिन्हें इतिहास याद रखता है, दूसरे उक्ति को चरितार्थ करते हुए लोग। पुस्तक की शुरूआत सन् 1959 में किसी बाबा द्वारा आयोजित किसी गाँव में सम्पन्न होने वाले एक यज्ञ समारोह तथा उसका ग्रामीण वातावरण पर पड़ने वाले नाना प्रकार के प्रभावों को समझने के प्रयास के साथ होता है, दूसरे अध्याय में संत विनोबा भावे के नेतृत्व में 'सर्वोदय' अधिवेशन वर्णन करने का प्रयास है, तीसरे में सन्यासी बनने की प्रक्रिया अर्थात दीक्षा- कर्मकांड आदिका वर्णन है जिनसे मै गुजरा हूं।Krishna Gopal Chaudhary
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